खिल उठी है आज मेरे दिल में फिर जीने की चाहत
सुन रहा हु आनेवाले मौत के कदमो की आहात
ज़िन्दगी तुझसे मैं मांगू सांस लेने की फुर्सत
दे सकू जाते हुए मैं कुछ पलों की मुस्कराहट
दर्द मेरा कह रहा था और तड़पाउन तुझे
मौत मुझसे कह रही थी आज ले जाऊं तुझे
कैद से इस जिस्म के रूह फिर आज़ाद हो
ज़िन्दगी तेरी पनाह में मौत अब आबाद हो
क्या किया मैंने जहाँ में जो कहू मैं या खुदा
चाँद लम्हों की दे मोहलत कह सकूँ मैं अलविदा
जो किया अपने लिए बस कर न पाया मैं वफ़ा
खुश न कर पाया किसीको खुद से था जो मैं खफा
अब हुआ एहसास मुझको क्या किया मैंने यहाँ
दर्द बनता ही रहा मैं बन न पाया मैं दावा
एक मौका दे मुझे कोशिश करून बांटू ख़ुशी
आखरी ख्वाहिश है होंठों पे मैं लाऊँगा हसी ..
The author, Kartiik Kulkarni blogs at http://rebelinpeace.blogspot.com

